बंगाल चुनाव से पहले भारी हलचल: TMC को तगड़ा झटका, I-PAC ने बंगाल में कामकाज रोका
बड़ी संख्या में कर्मचारियों की छुट्टी, ममता बनर्जी का बड़ा बयान- "नौकरी गई तो हम देंगे काम"

कोलकाता/नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के पहले चरण के मतदान से ठीक चार दिन पहले राज्य की राजनीति में बड़ा भूचाल आ गया है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के लिए चुनावी रणनीति बनाने वाली संस्था I-PAC (इण्डियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी) ने अचानक बंगाल में अपने कामकाज को समेटने के संकेत दिए हैं। आंतरिक सूत्रों के अनुसार, संस्था ने अपने कर्मचारियों को 20 दिनों की छुट्टी पर जाने को कहा है, जिसे लेकर राजनीतिक गलियारों में इस्तीफों और कामकाज बंद होने की अटकलें तेज हो गई हैं।
क्यों थमा I-PAC का काम?
हाल ही में केंद्रीय जांच एजेंसियों (ED) द्वारा I-PAC से जुड़े ठिकानों पर की गई छापेमारी और संस्था के निदेशकों को भेजे गए समन को इस बड़े फैसले का मुख्य कारण माना जा रहा है।
- जांच का शिकंजा: कथित हवाला और कोयला घोटाले से जुड़े मामलों में I-PAC के शीर्ष अधिकारियों से पूछताछ की जा रही है।
- ऑपरेशंस सस्पेंड: कंपनी ने आंतरिक ईमेल के जरिए कर्मचारियों को सूचित किया है कि कानूनी पेचीदगियों के कारण फिलहाल काम रोका जा रहा है।
- इस्तीफों की खबर: चर्चा है कि अनिश्चितता के माहौल में बड़ी संख्या में ग्राउंड स्टाफ और रणनीतिकारों ने साथ छोड़ दिया है।
ममता बनर्जी का “मास्टरस्ट्रोक” और आश्वासन
इस खबर के बाहर आते ही मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपनी चुनावी सभाओं में मोर्चा संभाल लिया है। उन्होंने इसे केंद्र सरकार और भाजपा की साजिश करार देते हुए कहा:
“वे हमारी मदद करने वाली एजेंसियों को डरा रहे हैं। अगर I-PAC के लोगों की नौकरी जाती है या उन्हें परेशान किया जाता है, तो चिंता न करें। मैं उन सभी को अपनी पार्टी में शामिल करूंगी और उन्हें काम दूंगी। हम एक भी व्यक्ति को बेरोजगार नहीं होने देंगे।”
TMC ने बताया ‘भ्रामक प्रचार’
वहीं, तृणमूल कांग्रेस ने आधिकारिक तौर पर इन खबरों को भाजपा का ‘डर्टी गेम’ बताया है। पार्टी का कहना है कि कामकाज बंद नहीं हुआ है, बल्कि जांच एजेंसियों के दबाव के कारण रणनीतियों में बदलाव किया गया है। अभिषेक बनर्जी भी स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं।
टुडे इंडिया न्यूज़ एमपी विश्लेषण:
बंगाल चुनाव के मुहाने पर I-PAC जैसी बड़ी चुनावी मशीनरी का पीछे हटना TMC के लिए संगठनात्मक स्तर पर चुनौतीपूर्ण हो सकता है। अब देखना यह होगा कि ममता बनर्जी का ‘स्वदेशी’ कार्यकर्ता मॉडल इस हाई-टेक चुनावी युद्ध में कितनी मजबूती से टिक पाता है।




