Welcome to Today India News MP   Click to listen highlighted text! Welcome to Today India News MP
E-Paperhttps://todayindianewsmp.live/wp-content/uploads/2024/01/jjujuu.gifUncategorizedचुनाव आयोग भारत सरकारटेक्नोलॉजीटॉप न्यूज़तमिलनाडुतेलंगानादेशनईदिल्लीनागालैंडनिवाड़ीपंजाबपटनाबिहारभोपालमणिपुरमध्य प्रदेशमध्यप्रदेश श्रमजीवी पत्रकार संघमहाराष्ट्रमहिला आरक्षणमहिला आरक्षण बिल2026यूपीराजनीतिराजस्थानराष्ट्रपति भवनलोकसभाशिक्षासुप्रीमकोर्टसेवा तीर्थ PMOसोशल मीडिया प्लेटफार्म

543 का आंकड़ा और 121 करोड़ की आबादी – क्या अब समय आ गया है ‘लोकतंत्र के विस्तार’ का?

53 सालों से थमा है सीटों का परिसीमन; एक सांसद पर 22 लाख जनता का बोझ, क्या यह प्रतिनिधित्व के साथ न्याय है?

नई दिल्ली/भोपाल:
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, लेकिन क्या इस लोकतंत्र का ढांचा आज की वास्तविकताओं के साथ न्याय कर पा रहा है? यह सवाल एक बार फिर चर्चा में है। 1971 की जनगणना के आधार पर तय की गई 543 लोकसभा सीटें आज 2026 के मुहाने पर खड़ी हैं, लेकिन जनसंख्या और प्रतिनिधित्व के बीच की खाई गहरी होती जा रही है।
आंकड़ों का गणित: 10 लाख बनाम 22 लाख
​जब 1973 में सीटों का निर्धारण हुआ, तब आधार 1971 की जनगणना थी। उस समय औसतन 10 लाख मतदाताओं पर एक सांसद होता था। आज 2011 की जनगणना (जो कि अब पुरानी हो चुकी है) के अनुसार भी यह औसत 22 लाख को पार कर चुका है।
सवाल: क्या एक सांसद के लिए 22 लाख लोगों की समस्याओं को सुनना और उनके क्षेत्र का विकास करना व्यावहारिक रूप से संभव है?
​तर्क: जानकारों का मानना है कि प्रतिनिधित्व की कमी के कारण आम जनता और उनकी आवाज संसद तक उतनी प्रभावी ढंग से नहीं पहुँच पा रही है, जितनी पहुँचनी चाहिए।
उत्तर बनाम दक्षिण: जनसंख्या और दोष का विवाद
​सीटों की बढ़ोतरी में सबसे बड़ी बाधा ‘क्षेत्रीय असंतुलन’ है।
दक्षिण भारत का पक्ष: तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक जैसे राज्यों ने दशकों तक परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण पर बेहतरीन काम किया। उन्हें डर है कि यदि जनसंख्या के आधार पर सीटें बढ़ीं, तो अच्छा काम करने के बावजूद संसद में उनकी आवाज कम हो जाएगी।
उत्तर भारत का तर्क: उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों का तर्क है कि लोकतंत्र में ‘सिर गिने जाते हैं’। यदि यहाँ की जनसंख्या बढ़ी है, तो यहाँ के नागरिकों को उनके लोकतांत्रिक अधिकार से वंचित क्यों रखा जाए? क्या बढ़ती आबादी के कारण वहां के नागरिकों का प्रतिनिधित्व कम होना न्यायोचित है?
विपक्ष का विरोध और राजनीतिक पेंच
​विपक्षी दलों का विरोध मुख्य रूप से ‘संघीय ढांचे’ (Federal Structure) को लेकर है। उनका तर्क है कि सीटों के बढ़ने से हिंदी भाषी राज्यों का वर्चस्व बढ़ जाएगा, जिससे गैर-हिंदी भाषी राज्यों में अलगाव की भावना पैदा हो सकती है। हालांकि, सरकार का पक्ष है कि नए संसद भवन (जिसमें 888 लोकसभा सदस्यों के बैठने की व्यवस्था है) का निर्माण भविष्य की इसी जरूरत को देखते हुए किया गया है।
महिला आरक्षण: हकदारी की नई बहस
​इस पूरी चर्चा में ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ यानी महिला आरक्षण एक क्रांतिकारी मोड़ है।
​महिलाओं को 33% आरक्षण देने का प्रावधान तो हो गया है, लेकिन इसे लागू करने के लिए परिसीमन (Delimitation) अनिवार्य है।
​यदि सीटें नहीं बढ़ती हैं, तो मौजूदा पुरुष सांसदों की सीटें कम होंगी, जिससे राजनीतिक संघर्ष बढ़ेगा।
​सीटों की संख्या बढ़ाना ही एकमात्र ऐसा रास्ता है जिससे पुरुषों की मौजूदा हिस्सेदारी को प्रभावित किए बिना महिलाओं को उनका उचित हक (बराबर की हकदारी) दिया जा सकता है।
निष्कर्ष: आखिर कब तक?
​1971 से 2024 तक, यानी पिछले 53 सालों से भारत ने अपनी राजनीतिक सीमाओं को नहीं बदला है। 2026 में परिसीमन पर लगा ‘फ्रीज’ खत्म होने वाला है। अब समय आ गया है कि एक ऐसा मध्यम मार्ग निकाला जाए जहाँ दक्षिण भारतीय राज्यों के हितों की रक्षा भी हो और उत्तर भारत के बढ़ते जनसंख्या घनत्व को उचित प्रतिनिधित्व भी मिले।
टुडे इंडिया न्यूज़ एमपी के लिए ब्यूरो रिपोर्ट।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!
Click to listen highlighted text!