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बंदूक पर भारी पड़ा विकास; ‘रेड कॉरिडोर’ में कैसे खत्म हो रहा है माओवाद का वजूद?

​शांति का नया अर्थशास्त्र: बस्तर से गढ़चिरौली तक सड़कों और मोबाइल टावरों ने तोड़ी उग्रवाद की कमर, 10 साल में 126 से घटकर महज 38 जिलों तक सिमटा प्रभाव।

नई दिल्ली/रायपुर/भोपाल:

भारत के नक्शे पर कभी ‘लाल घेरे’ (Red Corridor) के रूप में पहचाने जाने वाले अशांत क्षेत्रों से अब हिंसा की चीखों के बजाय विकास की पदचाप सुनाई दे रही है। हालिया आंकड़ों और विशेषज्ञों की रिपोर्ट बताती है कि वामपंथी उग्रवाद (LWE) के खिलाफ भारत की सबसे बड़ी जीत केवल हथियारों से नहीं, बल्कि ‘शांति के अर्थशास्त्र’ से आई है।

आंकड़ों की जुबानी: सिमटता दायरा

​एक दशक पहले तक माओवादी हिंसा में हर साल 1,100 से अधिक जानें जाती थीं। लेकिन 2024 तक आते-आते यह तस्वीर पूरी तरह बदल गई है:

  • प्रभावित जिले: 2013 में 126 जिलों से घटकर 2024 में मात्र 38 रह गए हैं।
  • कनेक्टिविटी का जादू: अकेले बस्तर में मोबाइल टावरों की संख्या 2021 में 581 थी, जो अब 3,244 गांवों तक पहुंच चुकी है।
  • दूरी हुई कम: नारायणपुर-दंतेवाड़ा मार्ग अब 10 घंटे के बजाय महज 5 घंटे में तय हो रहा है।

विकास के तीन स्तंभ: जिसने बदला परिदृश्य

​ओआरएफ (ORF) की विशेष रिपोर्ट के अनुसार, सरकार ने उग्रवाद को केवल सुरक्षा समस्या नहीं बल्कि ‘विकास की विफलता’ माना। इस रणनीति के तीन मुख्य आधार रहे:

  1. सार्वजनिक निवेश: दुर्गम क्षेत्रों में सड़क, पुल और दूरसंचार का जाल बिछाना।
  2. बाजार एकीकरण: स्थानीय आदिवासी उत्पादों और श्रम को राष्ट्रीय बाजारों से जोड़ना।
  3. वित्तीय समावेशन: मोबाइल नेटवर्क के जरिए सीधे बैंक खातों में सरकारी मदद (DBT) पहुंचाना, जिससे विद्रोहियों का सूचना तंत्र ध्वस्त हो गया।

पुलिस शिविर अब ‘शासन के केंद्र’

​अब पुलिस कैंप केवल ऑपरेशन के लिए नहीं, बल्कि बुनियादी सुविधाओं के लिए जाने जा रहे हैं। इन शिविरों के माध्यम से पहली बार कई गांवों में बस सेवा शुरू हुई है और 73 से अधिक पुस्तकालय खोले गए हैं। ‘बस्तारिया बटालियन’ जैसी पहलों ने 1,100 से अधिक स्थानीय युवाओं को रोजगार देकर उन्हें मुख्यधारा से जोड़ा है।

बदलती जीवनशैली: गोलियों की जगह अब गाड़ियों की गूंज

​आर्थिक बदलाव का सबसे बड़ा संकेत यह है कि आंतरिक आदिवासी क्षेत्रों में दोपहिया वाहनों की बिक्री में तीन गुना वृद्धि हुई है। गढ़चिरौली जैसे इलाकों में इस्पात उद्योग के आने से 1.5 लाख नए रोजगार मिलने की संभावना है। यह इस बात का प्रमाण है कि जब राज्य सड़कों और कल्याणकारी योजनाओं के जरिए लोगों के घर तक पहुंचता है, तो उग्रवाद की जड़ें अपने आप कमजोर होने लगती हैं।

निष्कर्ष

​यद्यपि भूमि अधिकार और वन प्रशासन जैसे मुद्दे अभी भी चुनौती बने हुए हैं, लेकिन ‘रेड कॉरिडोर’ का भौतिक और मानसिक रूप से बदलना यह साबित करता है कि विकास ही स्थायी शांति का एकमात्र मार्ग है।

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