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इस्लामाबाद शांति वार्ता विफल, क्या पाकिस्तान की मध्यस्थता पर फिरा पानी?

अमेरिका-ईरान युद्ध: सीजफायर पर बातचीत टूटी; मेज़बान पाकिस्तान और उसके हुक्मरानों की भूमिका पर उठे सवाल!

इस्लामाबाद/नई दिल्ली:

दुनिया की सांसें थाम देने वाली अमेरिका और ईरान के बीच की शांति वार्ता रविवार को बिना किसी समझौते के समाप्त हो गई। पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में हुई इस 21 घंटे लंबी बातचीत के बाद अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस (JD Vance) खाली हाथ रवाना हो गए। इस विफलता के बाद अब अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों में यह बहस तेज हो गई है कि क्या पाकिस्तान और उसके हुक्मरान इस ऐतिहासिक अवसर को भुनाने में नाकाम रहे?

विफलता के पीछे के मुख्य कारण

​शांति वार्ता के विफल होने के पीछे कई तकनीकी और राजनीतिक कारण सामने आए हैं:

  • परमाणु कार्यक्रम पर अड़ियल रुख: अमेरिका ने स्पष्ट किया कि ईरान अपने परमाणु हथियारों के कार्यक्रम को पूरी तरह बंद करने की लिखित प्रतिबद्धता देने को तैयार नहीं था।
  • लेबनान का मुद्दा: ईरान ने शांति समझौते को लेबनान में इजरायली हमलों के रुकने से जोड़ दिया, जिसे अमेरिका ने स्वीकार नहीं किया।
  • हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz): ईरान इस महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्ग पर अपना नियंत्रण बनाए रखना चाहता है, जबकि अमेरिका इसे अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए पूरी तरह खुला रखने की शर्त पर अड़ा है।

क्या पाकिस्तान और उसके हुक्मरान जिम्मेदार हैं?

​इस विफलता के बाद पाकिस्तान की भूमिका पर दोतरफा राय बन रही है:

1. मेजबान के रूप में विफलता?

आलोचकों का तर्क है कि पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ द्वारा इजरायल के खिलाफ दिए गए विवादास्पद बयानों ने वार्ता से पहले ही माहौल बिगाड़ दिया था। इजरायल ने पाकिस्तान की निष्पक्षता पर सवाल उठाए, जिससे अमेरिका पर भी दबाव बढ़ा।

2. सेना और सरकार के बीच का तालमेल:

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर ने इस वार्ता को सफल बनाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाया था। हालांकि, पाकिस्तान की अपनी आंतरिक आर्थिक बदहाली और अफगानिस्तान के साथ जारी सीमा विवाद ने उसकी ‘सॉफ्ट पावर’ को कमजोर किया, जिससे वह दोनों महाशक्तियों पर दबाव बनाने में असमर्थ रहा।

3. मध्यस्थ की सीमाएं:

विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक अमेरिका और ईरान के ‘कोर इश्यूज’ (परमाणु और क्षेत्रीय प्रभुत्व) हल नहीं होते, तब तक दुनिया का कोई भी देश—चाहे वह पाकिस्तान हो या कोई और—समझौता नहीं करा सकता। पाकिस्तान ने मंच तो उपलब्ध कराया, लेकिन दोनों देशों के बीच के गहरे अविश्वास की खाई को पाटने में उसके हुक्मरान नाकाम रहे।

विशेष नोट: वर्तमान में 14 दिनों का अस्थायी सीजफायर लागू है, लेकिन बातचीत टूटने के बाद इसके आगे बढ़ने की उम्मीदें कम हो गई हैं। अगर युद्ध दोबारा शुरू होता है, तो इसका सीधा असर भारत सहित पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और तेल की कीमतों पर पड़ेगा।

 

ब्यूरो रिपोर्ट, टुडे इंडिया न्यूज एमपी

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