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​एमपी के शिक्षकों को बड़ा झटका: सुप्रीम कोर्ट का सख्त आदेश- “बिना TET पास किए अब कोई नहीं रहेगा शिक्षक

​1.5 लाख शिक्षकों की कुर्सी खतरे में; कोर्ट ने कहा- "गुणवत्ता से समझौता नहीं, जो छूट मिलनी थी वह मिल चुकी"

भोपाल/दिल्ली:

मध्य प्रदेश के करीब डेढ़ लाख सरकारी शिक्षकों के भविष्य पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम सुनवाई के दौरान स्पष्ट कर दिया है कि शिक्षा की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) अनिवार्य है। कोर्ट ने दो टूक शब्दों में कहा है कि बिना पात्रता परीक्षा पास किए अब कोई भी शिक्षक अपने पद पर नहीं बना रह सकता।

क्या है पूरा मामला?

​यह विवाद मुख्य रूप से उन शिक्षकों से जुड़ा है जिनकी नियुक्ति वर्ष 1998 से 2009 के बीच राज्य सरकार की मेरिट प्रक्रिया के तहत हुई थी। उस समय TET की अनिवार्यता नहीं थी। हालांकि, 2009 में शिक्षा का अधिकार (RTE) एक्ट आने और NCTE के नए नियमों के बाद इसे अनिवार्य कर दिया गया।

​हालिया सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने स्पष्ट किया कि:

  • छूट की अवधि समाप्त: वर्ष 2017 में नियम लागू होने के बाद शिक्षकों को जरूरी योग्यता हासिल करने के लिए 5 साल का समय दिया गया था, जो अब बीत चुका है।
  • सेवा समाप्ति का डर: कोर्ट ने संकेत दिए हैं कि यदि शिक्षक तय समय सीमा के भीतर परीक्षा पास नहीं करते हैं, तो उनकी सेवा समाप्त की जा सकती है या उन्हें अनिवार्य सेवानिवृत्ति (Compulsory Retirement) दी जा सकती है।
  • समान नियम: अदालत ने कहा कि जो नियम नए अभ्यर्थियों के लिए हैं, वही कार्यरत (In-service) शिक्षकों पर भी लागू होंगे।

शिक्षकों में भारी आक्रोश और प्रदर्शन

​सुप्रीम कोर्ट के इस कड़े रुख के बाद मध्य प्रदेश के शिक्षक संगठनों ने मोर्चा खोल दिया है। भोपाल सहित कई जिलों में शिक्षकों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है। शिक्षक संघों का तर्क है कि दशकों से सेवा दे रहे अनुभवी शिक्षकों को इस उम्र में परीक्षा के लिए मजबूर करना “अन्यायपूर्ण और पूर्वव्यापी (Retrospective)” है।

अब आगे क्या?

​फिलहाल मामले में 70 से अधिक याचिकाओं पर सुनवाई जारी है, लेकिन कोर्ट के अब तक के रुख से शिक्षकों को राहत मिलने की उम्मीद कम ही नजर आ रही है। मध्य प्रदेश सरकार और स्कूल शिक्षा विभाग अब कोर्ट के लिखित आदेश का इंतज़ार कर रहे हैं, जिसके बाद इन डेढ़ लाख शिक्षकों के भाग्य का अंतिम फैसला होगा।

“न्यायालय बच्चों के भविष्य और शिक्षा के अधिकार (Article 21A) की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए योग्य शिक्षकों का होना अनिवार्य है।”सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

 

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