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​इतिहास गवाह: संकट में ‘त्याग’ ही बना देश का कवच

​नेहरू से मोदी तक; जब-जब प्रधानमंत्री ने पुकारा, देशवासियों ने न्योछावर कर दिया अपना 'आज'

नई दिल्ली/मध्य प्रदेश (टुडे इंडिया न्यूज):

भारत का इतिहास केवल युद्धों और विजयों की गाथा नहीं है, बल्कि यह नागरिक अनुशासन और ‘त्याग’ की मिसाल भी है। वर्तमान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा की जा रही अपीलों को यदि इतिहास के झरोखे से देखा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि देश के नेतृत्व ने जब भी कठिन समय में जनता से साथ मांगा, भारतीयों ने स्वेच्छा से अपनी सुख-सुविधाओं का बलिदान दिया।

​विरासत में मिला है ‘समर्पण’ का भाव

​भारतीय राजनीति के पन्नों को पलटें तो संकट के समय जनता से अपील करने की परंपरा दशकों पुरानी है:

  • ​जवाहरलाल नेहरू (1962): चीन युद्ध के दौरान नेहरू की अपील पर देश की महिलाओं ने अपना सोना तक सरकारी कोष में दान कर दिया था। उस वक्त ‘नेशनल डिफेंस फंड’ में आम आदमी का योगदान प्रेरणादायी था।
  • ​लाल बहादुर शास्त्री (1965): ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा देने वाले शास्त्री जी ने जब देश में अन्न संकट देखा, तो उन्होंने देशवासियों से एक वक्त का उपवास रखने की अपील की। करोड़ों भारतीयों ने स्वेच्छा से सोमवार का व्रत रखना शुरू कर दिया था।
  • ​इन्दिरा गांधी (1971): बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान आर्थिक दबाव के बावजूद इन्दिरा गांधी ने जनता के भरोसे और सहयोग से देश को बड़ी जीत दिलाई।
  • ​मनमोहन सिंह (2008-2012): वैश्विक आर्थिक मंदी के दौर में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मितव्ययिता (Austerity) और संसाधनों के सही उपयोग की अपील की थी, ताकि देश की अर्थव्यवस्था को स्थिर रखा जा सके।

​नरेंद्र मोदी: अपील का आधुनिक स्वरूप

​2012 (मुख्यमंत्री काल) से लेकर अब तक (प्रधानमंत्री काल), नरेंद्र मोदी ने इस परंपरा को एक नए स्तर पर पहुंचाया है। चाहे वह ‘Give It Up’ अभियान के तहत गैस सब्सिडी छोड़ने की बात हो, या कोविड-19 के दौरान जनता कर्फ्यू और ‘संकल्प’ की अपील—जनता ने हर बार अपने निजी हितों को राष्ट्रहित के पीछे रखा है।

​निष्कर्ष: संकट में एक होता राष्ट्र

​टुडे इंडिया न्यूज के लिए यह विश्लेषण दर्शाता है कि पीएम की अपील महज एक संबोधन नहीं, बल्कि उस राष्ट्रीय चरित्र का आह्वान है जो संकट के समय ‘स्व’ से ऊपर ‘देश’ को रखता है। इतिहास गवाह है कि जब भी नेतृत्व ने ईमानदारी से हाथ फैलाया है, इस देश की जनता ने अपनी सामर्थ्य से बढ़कर योगदान दिया है।

​ब्यूरो रिपोर्ट: टुडे इंडिया न्यूज, एमपी

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