## UN में भारत का दोटूक: मानवाधिकार के नाम पर नहीं चलेगा पश्चिमी एजेंडा, दोहरे मानदंडों पर कड़ा प्रहार
संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत ने वैश्विक निकायों को आईना दिखाते हुए स्पष्ट किया कि मानवाधिकार राजनीतिक दबाव का हथियार नहीं बन सकते।

टुडे इंडिया न्यूज एमपी
नई दिल्ली में प्रदर्शनों और आंतरिक मामलों पर यूएन विशेषज्ञों की एकतरफा टिप्पणियों को भारत ने किया खारिज।
यूरोपीय देशों और पश्चिमी मंचों में मानवाधिकार के नाम पर चुप्पी और दोहरे रवैये पर उठे गंभीर सवाल।
नई दिल्ली/भोपाल:
संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) की तीसरी समिति की बैठक में भारत ने मानवाधिकारों के मुद्दों पर एक कड़ा और स्पष्ट संदेश दिया है। भारत ने दो टूक शब्दों में कहा है कि मानवाधिकार जैसे संवेदनशील और पवित्र विषय का इस्तेमाल चुनिंदा देशों पर राजनीतिक दबाव बनाने या उन्हें निशाना बनाने के औजार के रूप में नहीं किया जाना चाहिए। भारत के इस मुखर रुख ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पश्चिमी देशों की दोहरी नीतियों और कथित मानवाधिकार के ठेकेदारों को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
## ‘मानवाधिकार राजनीतिक दबाव का जरिया नहीं’
संयुक्त राष्ट्र में भारत की ओर से पक्ष रखते हुए कड़े शब्दों में कहा गया कि भारत अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार तंत्र के साथ संवाद और सहयोग के लिए हमेशा तैयार है, लेकिन यह प्रक्रिया आपसी सम्मान और वास्तविक तथ्यों पर आधारित होनी चाहिए, न कि किसी पूर्वाग्रह या पश्चिमी राजनीतिक एजेंडे के तहत।
हाल ही में नई दिल्ली में हुए कुछ प्रदर्शनों और आंतरिक प्रशासनिक प्रक्रियाओं को लेकर संयुक्त राष्ट्र के कुछ विशेषज्ञों द्वारा बिना पूरी जानकारी के टिप्पणियां की गई थीं। भारत ने इन एकतरफा और अधूरे आंकड़ों पर आधारित रिपोर्टों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि देश की मजबूत लोकतांत्रिक व्यवस्था और न्यायपालिका नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने में पूरी तरह सक्षम है। आंतरिक मामलों में इस तरह का अनुचित हस्तक्षेप और बिना तथ्यों के बयानबाजी भारत को स्वीकार्य नहीं है।
## यूरोप और पश्चिमी देशों में मानवाधिकार पर यूएन क्यों चुप?
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों और विश्लेषकों का यह भी सवाल है कि पश्चिमी देशों और यूरोप के भीतर होने वाली घटनाओं, शरणार्थियों के संकट, नस्लीय भेदभाव और आंतरिक पुलिस कार्रवाइयों पर यूएन के यही विशेषज्ञ और मानवाधिकार निकाय अक्सर मौन क्यों रहते हैं? भारत के इस कड़े रुख ने एक बार फिर वैश्विक मानवाधिकार संगठनों की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता और निष्पक्षता की कमी के बड़े मुद्दों को उजागर कर दिया है।
भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को चुनिंदा बयानों और अपुष्ट रिपोर्टों के जरिए बदनाम करने की कोशिशों को किसी भी कीमत पर सहन नहीं किया जाएगा। संप्रभु राष्ट्र के रूप में भारत अपने आंतरिक निर्णयों और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
संयुक्त राष्ट्र में भारत की दो टूक—मानवाधिकारों का राजनीतिकरण अस्वीकार्य।
पश्चिमी एजेंडे और दोहरे मानदंडों के खिलाफ भारत की मजबूत कूटनीतिक प्रतिक्रिया।देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं और संप्रभुता पर बाहरी हस्तक्षेप को नकारा।
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