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भारत-तुर्की संबंधों में ‘सॉफ्ट’ रुख: क्या ब्रह्मोस और आकाश मिसाइलों का है डर?
पाकिस्तान से दोस्ती भारत के लिए 'शत्रुता' नहीं: तुर्की

तुर्की / भारत :-
तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने एक महत्वपूर्ण संदेश देते हुए कहा है कि पाकिस्तान के साथ तुर्की की ‘बिरादरी’ वाली दोस्ती को भारत के प्रति किसी भी तरह की दुश्मनी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस्लामाबाद के लिए तुर्की का समर्थन भारत के साथ द्विपक्षीय सहयोग पर हावी नहीं होना चाहिए। फिदान ने जोर देकर कहा कि दोनों देश परिपक्व हैं और उन्हें अपने संबंधों को और आगे बढ़ाना चाहिए।
क्या भारत की रक्षा कूटनीति से दबाव में है तुर्की?
विशेषज्ञों का मानना है कि तुर्की का यह बयान अचानक नहीं आया है। इसके पीछे भारत की हालिया रणनीतिक चालें एक बड़ा कारण हो सकती हैं:
- आर्मेनिया और साइप्रस का साथ: भारत ने अजरबैजान के कट्टर विरोधी आर्मेनिया को ‘आकाश’ एयर डिफेंस सिस्टम और पिनाका रॉकेट लॉन्चर जैसे घातक हथियार दिए हैं। वहीं, साइप्रस के साथ भारत की बढ़ती नजदीकी और ब्रह्मोस मिसाइल खरीदने में साइप्रस की दिलचस्पी ने अंकारा (तुर्की की राजधानी) की चिंताएं बढ़ा दी हैं।
- रणनीतिक घेराबंदी: तुर्की जिस पूर्वी भूमध्य सागर को अपना ‘बैकयार्ड’ मानता है, वहां भारत का ब्रह्मोस मिसाइल और ड्रोन्स के साथ पहुंचना तुर्की के लिए एक बड़ी सामरिक चुनौती बन गया है।
- आर्थिक और राजनयिक दबाव: पिछले कुछ समय में भारत ने तुर्की पर कई कूटनीतिक और आर्थिक दबाव बनाए हैं, जिससे तुर्की को अपनी नीति बदलने पर मजबूर होना पड़ा है।
बदलाव के प्रमुख संकेत
तुर्की के रुख में इस बदलाव को ‘रणनीतिक मजबूरी’ के तौर पर देखा जा रहा है:
- स्वार्थ का संतुलन: तुर्की की खस्ताहाल अर्थव्यवस्था और भारत का एक उभरती वैश्विक शक्ति होना, इन दोनों के बीच तुर्की अब भारत को नजरअंदाज नहीं कर सकता।
- भारत का ‘क्विड प्रो को’ (Quid Pro Quo) रुख: भारत ने साफ कर दिया है कि अगर तुर्की कश्मीर जैसे मुद्दों पर पाकिस्तान का पक्ष लेता रहेगा, तो उसे इसकी कीमत भारत की तरफ से सीधे भू-राजनीतिक मोर्चों पर चुकानी होगी।
- विवेकपूर्ण कूटनीति: तुर्की अब समझ रहा है कि भारत अब केवल एक दक्षिण एशियाई खिलाड़ी नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर अपने हितों की रक्षा करने में सक्षम एक बड़ा ताकतवर देश बन चुका है।




