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​भारत के वैचारिक भविष्य पर महा-बहस: राष्ट्र निर्माण के दावों, संगठनों की सक्रियता और आंतरिक विरोध के सियासी मायने

​एक तरफ देश को 2047 तक इस्लामिक राष्ट्र बनाने के लिए विभिन्न संगठनों की सक्रियता के दावे, तो दूसरी तरफ हिंदू राष्ट्र के वैचारिक प्रकल्प पर डटा अकेला आरएसएस। ​विश्लेषकों की चिंता— बहुसंख्यक समाज का आंतरिक मतभेद और वैचारिक मोर्चे पर लगभग 20% लोगों द्वारा अपनी ही संस्कृति के एजेंडे का विरोध सबसे बड़ी चुनौती। ​टुडे इंडिया न्यूज की खास रिपोर्ट: जानिए क्या कहते हैं सामाजिक और वैचारिक मुद्दों के जानकार।

​टुडे इंडिया न्यूज स्पेशल रिपोर्ट​समाचार विस्तार (News Body):

​भोपाल/नई दिल्ली:

देश के वैचारिक और सामाजिक परिदृश्य पर इन दिनों एक बार फिर तीखी बहस छिड़ गई है। राष्ट्र निर्माण, संस्कृति और देश के भविष्य के स्वरूप को लेकर तमाम मंचों पर नए-नए दावे सामने आ रहे हैं। इस बीच यह मुद्दा सबसे ज्यादा चर्चा में है कि देश की डेमोग्राफी और वैचारिक दिशा को बदलने के लिए एक तरफ जहां सुनियोजित रूप से कई संगठन सक्रिय हैं, वहीं दूसरी तरफ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और हिंदू राष्ट्र की अवधारणा को आगे बढ़ाने के लिए मुख्य रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ही वैचारिक मोर्चे पर डटा नजर आता है।

​संगठनों की सक्रियता और मिशन के दावे

​विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों की रिपोर्टों और समय-समय पर हुए खुलासों (जैसे पूर्व में आए कुछ प्रतिबंधित संगठनों के दस्तावेजों) के हवाले से यह बात लगातार सामने आती रही है कि देश के आंतरिक ताने-बाने को प्रभावित करने और वैचारिक बदलाव लाने के लिए कई स्तरों पर प्रयास किए जाते रहे हैं। इसके विपरीत, हिंदुत्व और राष्ट्रवादी विचारधारा के समर्थकों का मुख्य केंद्र राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और उसके वैचारिक सहयोगी संगठन रहे हैं, जो समाज को एकजुट करने का कार्य कर रहे हैं।

​‘अपनों’ का विरोध और वैचारिक बिखराव

​इस पूरी बहस के बीच विश्लेषकों का एक वर्ग इस बात पर गहरी चिंता जता रहा है कि बाहरी या वैचारिक प्रतिद्वंद्वियों से ज्यादा बड़ी चुनौती आंतरिक मोर्चे पर है। सामाजिक-राजनीतिक अध्ययनों का हवाला देते हुए जानकारों का मानना है कि बहुसंख्यक समाज का एक बड़ा हिस्सा (लगभग 20% तक) ऐसा है जो वैचारिक, राजनीतिक या वैयक्तिक कारणों से अपनी ही संस्कृति, परंपरा और राष्ट्रवाद के एजेंडे का मुखर या प्रत्यक्ष विरोध करता है।

​जानकारों का यह भी मानना है कि जब तक बहुसंख्यक समाज वैचारिक रूप से पूरी तरह एकजुट नहीं होता और अपने आंतरिक मतभेदों को दूर नहीं करता, तब तक राष्ट्रहित से जुड़े बड़े वैचारिक लक्ष्यों को प्राप्त करने में सामाजिक स्तर पर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता रहेगा।

​टुडे इंडिया न्यूज का नजरिया: देश की वैचारिक दिशा, आंतरिक सुरक्षा और सामाजिक समरसता से जुड़े ये सवाल आज हर जागरूक नागरिक के जेहन में हैं। इस संवेदनशील और गंभीर विषय पर समाज के प्रबुद्ध वर्ग और विभिन्न संगठनों की क्या प्रतिक्रिया रहती है, इस पर हमारी पैनी नजर बनी रहेगी। मध्य प्रदेश और देश से जुड़ी ऐसी ही हर बड़ी और विश्लेषणात्मक खबर के लिए जुड़े रहिए टुडे इंडिया न्यूज के साथ।

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