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होर्मुज संकट के बीच बढ़ी वैश्विक तनातनी, BRICS बनाम NATO की चर्चा तेज; ट्रंप के बयान पर जयशंकर का दो-टूक संदेश

ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री मार्गों की सुरक्षा को लेकर दुनिया में बढ़ा तनाव, अमेरिका-पश्चिमी देशों और उभरते देशों के गठजोड़ के बीच नई कूटनीतिक खींचतान

BRICS,NATO,अमेरिका। दुनिया की भू-राजनीति इन दिनों तेजी से बदलती नजर आ रही है। एक तरफ उभरते देशों का संगठन BRICS अपना प्रभाव बढ़ा रहा है, तो दूसरी ओर पश्चिमी सैन्य गठबंधन NATO और अमेरिका नई चुनौतियों से जूझते दिखाई दे रहे हैं।

इसी बीच अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump के हालिया बयान ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में नई बहस छेड़ दी है।

खबरों के मुताबिक, पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और खासकर Strait of Hormuz से गुजरने वाले समुद्री व्यापार को लेकर अमेरिका ने अपने सहयोगी देशों से समर्थन की उम्मीद जताई है। यह समुद्री मार्ग दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद अहम माना जाता है, क्योंकि वैश्विक तेल और गैस का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है।

BRICS के बढ़ते प्रभाव से बढ़ी चिंता
विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले कुछ वर्षों में BRICS का प्रभाव तेजी से बढ़ा है। इस समूह में Brazil, Russia, India, China और South Africa जैसे बड़े उभरते देश शामिल हैं। हाल के वर्षों में इस संगठन ने वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में पश्चिमी देशों के वर्चस्व को चुनौती देने की दिशा में कई कदम उठाए हैं।

कई देशों ने डॉलर के विकल्प पर चर्चा शुरू की है और व्यापार में स्थानीय मुद्राओं के उपयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसी वजह से पश्चिमी देशों में यह धारणा बन रही है कि आने वाले समय में BRICS वैश्विक शक्ति संतुलन को बदल सकता है।

NATO और अमेरिका की रणनीति
दूसरी ओर, NATO लंबे समय से अमेरिका और यूरोपीय देशों के बीच सैन्य सहयोग का प्रमुख मंच रहा है। हालांकि हाल के वैश्विक संकटों और युद्ध जैसी स्थितियों के कारण इस गठबंधन की भूमिका पर भी सवाल उठने लगे हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि पश्चिम एशिया में अस्थिरता, ऊर्जा संकट और समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा जैसे मुद्दों ने अमेरिका और उसके सहयोगियों के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।

जयशंकर का स्पष्ट रुख
इन सबके बीच भारत ने अपनी स्वतंत्र कूटनीतिक नीति को बनाए रखने का संकेत दिया है। भारत के विदेश मंत्री S. Jaishankar कई मौकों पर यह स्पष्ट कर चुके हैं कि भारत किसी एक खेमे की राजनीति में फंसने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देता है।

भारत की नीति “रणनीतिक स्वायत्तता” पर आधारित रही है, जिसमें देश अलग-अलग वैश्विक मंचों पर अपने हितों के अनुसार फैसले लेता है। यही वजह है कि भारत एक ओर BRICS का सदस्य है, तो दूसरी ओर अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ भी मजबूत संबंध बनाए हुए है।
बदलता वैश्विक शक्ति संतुलन

विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले वर्षों में दुनिया में बहुध्रुवीय व्यवस्था (Multipolar World) और मजबूत हो सकती है। इसका मतलब है कि वैश्विक शक्ति अब केवल एक या दो देशों के हाथ में न रहकर कई बड़े देशों और समूहों में बंट सकती है।

ऐसे में ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार, तकनीक और सैन्य सहयोग जैसे मुद्दों पर नई रणनीतियां बनती दिखाई दे रही हैं।

निष्कर्ष:
पश्चिम एशिया के संकट, ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक गठबंधनों की राजनीति ने दुनिया को एक बार फिर बड़े कूटनीतिक मोड़ पर ला खड़ा किया है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि BRICS, NATO और अन्य वैश्विक शक्तियों के बीच संतुलन किस दिशा में जाता है और इसमें भारत की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण साबित होती है।

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