NEET विवाद और इस्तीफे की राजनीति: ‘शिक्षा सुधार बनाम राजनीतिक घेराबंदी’ पर छिड़ी पोस्टर वॉर
अतीत के पेपर लीक मामलों का ब्योरा और धर्मेंद्र प्रधान द्वारा किए गए सिलेबस बदलावों को लेकर सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में गरमाया माहौल; 'शिक्षा को राजनीति नहीं, सुधार चाहिए' का नारा तेज।

टुडे इंडिया न्यूज़ – एमपी (Today India News MP)
विशेष रिपोर्ट / राजनीति व शिक्षा हलचल
भोपाल / नई दिल्ली:
देशभर में NEET (नीट) परीक्षा और नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) को लेकर जारी घमासान के बीच अब राजनीतक और सामाजिक स्तर पर बहस तेज हो गई है। एक तरफ जहाँ विपक्षी दल और छात्र संगठन केंद्रीय शिक्षा मत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर अड़े हुए हैं, वहीं दूसरी तरफ केंद्रीय शिक्षा मंत्री के समर्थन में आंकड़ों और ऐतिहासिक तथ्यों के साथ एक नया पोस्टर व इन्फोग्राफिक अभियान सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है।
अतीत का इतिहास: कब-कब लीक हुए पेपर और किसने दिया इस्तीफा?
सोशल मीडिया पर साझा किए जा रहे आंकड़ों के अनुसार, अतीत में कई बड़े पेपर लीक और भर्ती अनियमितताओं के मामले सामने आए, लेकिन उस समय के तत्कालीन शिक्षा मंत्रियों ने इस्तीफे नहीं दिए थे।
विगत वर्षों के प्रमुख मामले:
- 2006: AIIMS MBBS पेपर लीक (कांग्रेस/UPA सरकार)
- 2009: हरियाणा शिक्षक भर्ती मामला (कांग्रेस सरकार)
- 2011: AIEEE पेपर लीक (कांग्रेस/UPA सरकार)
- 2011: UPPCS मामला (बसपा सरकार)
- 2012-2014: AIIMS MBBS, रेलवे ग्रुप-डी भर्ती, मुंबई यूनिवर्सिटी, कर्नाटक PUC, और CBSE 12वीं भौतिकी पेपर लीक (कांग्रेस/UPA सरकार)
- 2015-2022: UPPCS (सपा), REET (राजस्थान कांग्रेस), JSSC CGL (झामुमो-कांग्रेस) एवं बिहार भर्ती मामले (महागठबंधन)
समर्थकों का तर्क है कि जब पूर्व की सरकारों के दौरान अनेक परीक्षाएं प्रभावित हुईं और किसी मंत्री ने इस्तीफा नहीं दिया, तो वर्तमान में NTA और उसके चेयरमैन के प्रशासनिक दायित्वों के बजाय केवल शिक्षा मंत्री को राजनीतिक निशाना क्यों बनाया जा रहा है?
शिक्षा मंत्री को निशाना बनाने का दावा: ‘सिलेबस बदलाव बना वजह’
जारी सूचना-सामग्री में यह दावा किया जा रहा है कि शिक्षा मंत्री को निशाना बनाए जाने के पीछे केवल परीक्षा की गड़बड़ी नहीं, बल्कि उनके द्वारा भारतीय शिक्षा व्यवस्था में किए गए क्रांतिकारी एवं बुनियादी बदलाव हैं।
धर्मेंद्र प्रधान के कार्यकाल में सिलेबस में हुए मुख्य बदलाव:
- इतिहास में सुधार: आपातकाल का पाठ शामिल करना, मुगलों का इतिहास हटाकर भारत के गौरवशाली इतिहास को प्राथमिकता देना।
- क्षेत्रीय राजवंशों को प्राथमिकता: मराठा, चोल, और मौर्य साम्राज्य सहित भारतीय शूरवीरों का शौर्य पाठ्यक्रम में जोड़ना।
- मातृभाषा में शिक्षा: प्राथमिक और स्कूली शिक्षा में मातृभाषा व क्षेत्रीय भाषाओं को बढ़ावा।
- आधुनिक व व्यावहारिक विषय: सर्जिकल स्ट्राइक जैसे सैन्य ऑपरेशन्स, साइबर सुरक्षा, डिजिटल साक्षरता और स्किल डेवलपमेंट को जोड़ना।
- नैतिक व भारतीय ज्ञान प्रणाली: योग, आयुर्वेद, पर्यावरण व जलवायु परिवर्तन, संविधान एवं कर्तव्यों के साथ-साथ वैज्ञानिक सोच और इनोवेशन पर जोर।
‘राजनीति नहीं, सुधार चाहिए’
सोशल मीडिया कैंपेन और समर्थकों द्वारा छात्रों और आम जनता से यह अपील की जा रही है कि:
“शिक्षा को राजनीति नहीं, बल्कि सुधार की जरूरत है। परीक्षा तंत्र की कमियों और NTA की जवाबदेही तय करने के साथ-साथ शिक्षा क्षेत्र में किए जा रहे सकारात्मक सुधारों को राजनीतिक साजिश का शिकार नहीं होने देना चाहिए।”
वर्तमान में यह मुद्दा मध्य प्रदेश सहित पूरे देश के राजनीतिक और शैक्षणिक हलकों में चर्चा का केंद्र बना हुआ है। अब देखना यह होगा कि सरकार परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता लाने और छात्रों के विश्वास को बहाल करने के लिए आगे क्या कदम उठाती है।



