निवाड़ी भाजपा जिला कार्यकारिणी घोषित: 20-25% पदों पर एक ही वर्ग का दबदबा, गहोई वैश्य समाज की उपेक्षा से गरमाई सियासत
निवाड़ी जिले में भाजपा की नई जिला कार्यकारिणी की घोषणा पर उठे सवाल। कार्यकारिणी में 20 से 25 प्रतिशत हिस्सेदारी एक ही वर्ग को मिलने की चर्चा। बुंदेलखंड के पारंपरिक और प्रभावशाली 'गहोई वैश्य समाज' को पूरी तरह नजरअंदाज करने पर गहरा आक्रोश। राजनीतिक चेतावनी: "बुंदेलखंड में गहोई वैश्य समाज अगर अपनी पर आ गई, तो सत्ताएं पलटने में देर नहीं लगेगी।"

टुडे इंडिया न्यूज एमपी (विशेष रिपोर्ट)
निवाड़ी। भारतीय जनता पार्टी (BJP) द्वारा निवाड़ी जिले में हाल ही में घोषित की गई नई जिला कार्यकारिणी को लेकर राजनीतिक गलियारों और स्थानीय स्तर पर सियासी पारा चढ़ गया है। पार्टी संगठन द्वारा घोषित सूची में जातीय समीकरणों को लेकर गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। चर्चा है कि नई कार्यकारिणी में लगभग 20 से 25 प्रतिशत पद अकेले ब्राह्मण समाज के हिस्से में आए हैं, जबकि बुंदेलखंड अंचल की रीढ़ माने जाने वाले और आर्थिक-सामाजिक रूप से बेहद मजबूत गहोई वैश्य समाज को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया है।
गहोई वैश्य समाज की अनदेखी पर भड़का आक्रोश
राजनीतिक जानकारों और स्थानीय कार्यकर्ताओं का कहना है कि भाजपा हमेशा ‘सबका साथ, सबका विकास’ का नारा देती है, लेकिन निवाड़ी जिले में जमीनी स्तर पर पार्टी को वैचारिक और आर्थिक रूप से मजबूती प्रदान करने वाले गहोई वैश्य समाज को हाशिए पर धकेल दिया गया है। महत्वपूर्ण पदों पर समाज के किसी भी प्रतिनिधि को उचित स्थान न मिलने से समाज के भीतर और राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है।
बुंदेलखंड का सियासी गणित और चेतावनी
बुंदेलखंड क्षेत्र के राजनीतिक इतिहास को खंगाला जाए तो गहोई वैश्य समाज का प्रभाव किसी से छिपा नहीं है। व्यापारिक और वैचारिक रूप से इस समाज को भाजपा का पारंपरिक वोटर माना जाता रहा है। ऐसे में राजनीतिक विश्लेषकों का कड़ा संदेश है कि भाजपा नेतृत्व यह भूल रहा है कि बुंदेलखंड में यदि गहोई वैश्य समाज अपनी पर आ गया और उसने उपेक्षा के खिलाफ रुख अख्तियार किया, तो सत्ता के समीकरण पलटने में देर नहीं लगेगी। चुनावों के वक्त यह नाराजगी पार्टी के लिए भारी नुकसान का सौदा साबित हो सकती है।
संगठन की कार्यप्रणाली पर उठ रहे गंभीर सवाल
कार्यकारिणी के ऐलान के बाद से ही पार्टी के भीतर आंतरिक कलह के सुगबुगाहट तेज हो गई है। कार्यकर्ताओं का एक बड़ा वर्ग दबी जुबान से यह मान रहा है कि यदि समय रहते जिला और प्रदेश नेतृत्व ने इस असंतोष को दूर करने के लिए सुधारात्मक कदम नहीं उठाए, तो इसका खामियाजा आगामी राजनीतिक और स्थानीय निकायों के चुनावों में भुगतना पड़ सकता है।
अब देखना यह होगा कि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व इस पूरे मामले पर क्या संज्ञान लेता है और नाराज समाज को साधने के लिए क्या डैमेज कंट्रोल किया जाता है।




