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बंगाल चुनाव से पहले सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख, हटाए गए 91 लाख मतदाताओं को वोट देने की इजाजत नहीं

​अदालत ने कहा- चुनाव प्रक्रिया के बीच मतदाता सूची में हस्तक्षेप नहीं, अपील के लिए ट्रिब्यूनल का रास्ता खुला

नई दिल्ली/कोलकाता:

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की दहलीज पर खड़े लाखों लोगों को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। अदालत ने सोमवार (13 अप्रैल 2026) को हुई सुनवाई में उन मतदाताओं को अंतरिम रूप से वोट डालने की अनुमति देने से इनकार कर दिया है, जिनके नाम स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से हटा दिए गए थे।

अदालत ने क्या कहा?

​मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि:

  • ​चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची फ्रीज (Freeze) किए जाने के बाद अब नई प्रविष्टियां या बदलाव संभव नहीं हैं।
  • ​चुनाव प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है (23 और 29 अप्रैल को मतदान), ऐसे में अदालत चुनाव के बीच में हस्तक्षेप कर संवैधानिक संकट पैदा नहीं करना चाहती।
  • ​अदालत ने कहा कि जिन लोगों के नाम हटाए गए हैं, वे अपीलीय न्यायाधिकरण (Appellate Tribunals) में अपनी अपील जारी रख सकते हैं, लेकिन इस चुनाव में उन्हें वोट देने की अंतरिम राहत नहीं दी जा सकती।

क्यों हटाए गए इतने नाम? (प्रमुख बिंदु)

  1. SIR प्रक्रिया: चुनाव आयोग ने मतदाता सूची को ‘शुद्ध’ करने के लिए Special Intensive Revision चलाया था।
  2. 91 लाख नाम कटे: रिपोर्ट के अनुसार, बंगाल में लगभग 90.83 लाख नाम हटाए गए हैं, जो कुल मतदाताओं का करीब 11.85% है।
  3. तार्किक विसंगतियां (Logical Discrepancies): नामों को हटाने के पीछे वर्तनी की गलतियाँ, एक ही घर में बड़ी संख्या में सदस्य और 2002 की आधार सूची से डेटा का मिलान न होना जैसे कारण बताए गए हैं।
  4. सीमावर्ती जिलों में असर: उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना और मुर्शिदाबाद जैसे जिलों में सबसे ज्यादा नाम हटाए गए हैं।

TMC और विपक्ष का विरोध

​ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने इस प्रक्रिया को “लोकतंत्र की हत्या” करार दिया है। पार्टी का आरोप है कि जानबूझकर उनके समर्थकों और विशेष समुदायों के नाम हटाए गए हैं। वहीं, चुनाव आयोग का कहना है कि यह प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी थी और न्यायिक अधिकारियों की देखरेख में संपन्न हुई है।

अब क्या होगा?

​अब वे सभी 91 लाख लोग, जिनके नाम कट चुके हैं, 23 और 29 अप्रैल को होने वाले मतदान में हिस्सा नहीं ले पाएंगे। उनके पास केवल ट्रिब्यूनल के माध्यम से भविष्य के लिए अपना नाम वापस जुड़वाने का विकल्प बचा है।

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