देश की न्याय व्यवस्था में सबसे बड़ा सुधार: सुप्रीम कोर्ट ने तय की डेडलाइन, 3 महीने के भीतर सुनाना होगा सुरक्षित फैसला
चीफ जस्टिस सूर्यकांत की पीठ का ऐतिहासिक निर्देश; जमानत याचिकाओं पर उसी दिन या 24 घंटे में फैसला जरूरी, लापरवाही पर जज से छिन सकता है केस!

नई दिल्ली: देश की न्यायिक प्रणाली में ‘तारीख पे तारीख’ और सुनवाई पूरी होने के बाद भी सालों तक फैसले लटके रहने की परंपरा पर सुप्रीम कोर्ट ने अब तक का सबसे कड़ा प्रहार किया है। सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी हाई कोर्ट (उच्च न्यायालयों) के लिए एक सख्त और बाध्यकारी समय-सीमा (डेडलाइन) तय कर दी है। कोर्ट ने आदेश दिया है कि अगर किसी भी मामले में सुनवाई पूरी होने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया गया है, तो उसे अधिकतम 3 महीने के भीतर हर हाल में सुनाना होगा।
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जोयमालया बागची की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए यह गाइडलाइन जारी की है। सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक शब्दों में कहा कि फैसलों में अनिश्चितकालीन देरी न्याय के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन है और इससे आम जनता का न्याय व्यवस्था पर भरोसा कमजोर होता है। यह ऐतिहासिक आदेश झारखंड हाई कोर्ट में उम्रकैद के कैदियों की अपीलों पर सुनवाई पूरी होने के बावजूद सालों तक फैसला न आने के मामले पर संज्ञान लेते हुए दिया गया है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश: जवाबदेही की नई व्यवस्था
यदि कोई हाई कोर्ट तय समय-सीमा के भीतर फैसला नहीं सुनाता है, तो सुप्रीम कोर्ट ने एक ‘कैस्केडिंग अकाउंटेबिलिटी मैकेनिज्म’ (जवाबदेही तंत्र) तैयार किया है:
- 3 महीने की समय-सीमा: सुनवाई पूरी होने के बाद अधिकतम 3 महीने के भीतर विस्तृत और तर्कसंगत फैसला सुनाना अनिवार्य होगा।
- मुख्य न्यायाधीश के पास जाएगा मामला: यदि 3 महीने में फैसला नहीं आता, तो मामला स्वचालित रूप से (ऑटोमैटिक) 2 सप्ताह के भीतर संबंधित हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस के सामने रखा जाएगा।
- केस ट्रांसफर का प्रावधान: चीफ जस्टिस संबंधित बेंच से बात कर 2 सप्ताह में फैसला देने को कहेंगे। इसके बाद भी यदि 1 महीने तक फैसला नहीं आता है, तो हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस उस केस को दूसरी बेंच को ट्रांसफर कर सकते हैं, जहां नए सिरे से सुनवाई होगी।
- मुकदमेबाजों को अधिकार: अब आम जनता या पक्षकार भी 3 महीने की अवधि बीत जाने पर जल्द फैसले के लिए आवेदन दायर कर सकेंगे, जिस पर कोर्ट को 2 कार्यदिवसों के भीतर सुनवाई करनी होगी।
व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर विशेष ध्यान: जमानत पर ‘उसी दिन’ फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने जेलों में बंद अंडरट्रायल कैदियों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Personal Liberty) से जुड़े मामलों पर बेहद संवेदनशील और कड़ा रुख अपनाया है। पीठ ने निर्देश दिया है:
”जमानत (Bail) और सजा निलंबन (Suspension of Sentence) की याचिकाओं पर सुनवाई के उसी दिन या अधिकतम अगले दिन (24 घंटे के भीतर) फैसला सुनाया जाना चाहिए और उसे वेबसाइट पर अपलोड किया जाना चाहिए।”
इसके साथ ही, कोर्ट ने तकनीकी और प्रशासनिक देरी को खत्म करने के लिए कहा है कि जमानत मिलते ही तुरंत इसकी जानकारी डिजिटल माध्यम से जेल प्रशासन को भेजी जाए, ताकि कैदी को उसी दिन या अगले दिन सुबह तक रिहा किया जा सके।
पारदर्शिता के लिए उठाए गए 5 बड़े कदम
अदालती कार्यवाही में पारदर्शिता लाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को तुरंत निम्नलिखित कदम उठाने के निर्देश दिए हैं:
- वेबसाइट अपडेट: बहस पूरी होते ही हाई कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर वह तारीख दर्ज करनी होगी, जिस दिन फैसला सुरक्षित (Reserved) रखा गया है।
- 24 घंटे में अपलोडिंग: फैसला सुनाए जाने के 24 घंटे के भीतर उसकी कॉपी वेबसाइट पर लाइव होनी चाहिए।
- सर्टिफाइड कॉपी पर 3 तारीखें: अब फैसलों की प्रमाणित प्रतियों (Certified Copies) पर अनिवार्य रूप से तीन तारीखें दर्ज होंगी—फैसला सुरक्षित रखने की तिथि, फैसला सुनाने की तिथि और विस्तृत आदेश वेबसाइट पर अपलोड होने की तिथि।
- ऑटोमैटिक अलर्ट: हर महीने के अंत में हाई कोर्ट के जजों और चीफ जस्टिस को एक ऑटोमैटिक ईमेल अलर्ट जाएगा, जिसमें समय-सीमा पार कर चुके लंबित फैसलों की पूरी सूची होगी।
- ऑपरेटिव पार्ट का स्टेटस: अगर कोर्ट केवल मुख्य फैसला (Operative Part) सुनाता है और विस्तृत कारण बाद में देने की बात कहता है, तो केस स्टेटस में साफ लिखना होगा कि ‘विस्तृत कारणों का इंतजार है’।
टुडे इंडिया न्यूज एमपी की रिपोर्ट: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट सहित देश के सभी 25 उच्च न्यायालयों में इस नियम के लागू होने से लाखों लंबित मामलों के निपटारे में तेजी आएगी। खासकर आपराधिक मामलों में बंद उन कैदियों को बड़ी राहत मिलेगी जो सिर्फ फैसले के इंतजार में सालों से सलाखों के पीछे दिन काट रहे हैं।




