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​जनता का सवाल: अगर सांसद पर हमला जनता पर हमला है, तो संसद में पीएम पर अभद्र टिप्पणी पूरे देश का अपमान क्यों नहीं?

​मर्यादा और दोहरे मापदंड पर छिड़ी बहस; क्या लोकतंत्र में संवैधानिक पदों की गरिमा केवल दलीय चश्मे से तय होगी?

विशेष रिपोर्ट (राजनीतिक डेस्क):

​हाल ही में विपक्षी सांसद अभिषेक बनर्जी पर हुए हमले की निंदा करते हुए लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने बयान दिया कि “किसी सांसद पर हमला केवल एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि उसे चुनने वाली जनता और हमारे साझा लोकतंत्र पर हमला है।” इस बयान के बाद अब आम जनता और राजनीतिक गलियारों में एक नया और बेहद गंभीर वैचारिक मोड़ आ गया है।

​जनता के बीच से यह तीखा सवाल उठ रहा है कि यदि जनता द्वारा चुने गए एक विपक्षी सांसद पर सड़क पर हुआ हमला उनके पूरे संसदीय क्षेत्र की जनता पर हमला माना जा सकता है, तो फिर देश के सर्वोच्च सदन (संसद) के भीतर जनप्रतिनिधियों द्वारा देश के प्रधानमंत्री पर की जाने वाली अमर्यादित टिप्पणियां और अभद्र भाषा क्या पूरे देश की जनता पर हमला नहीं मानी जानी चाहिए? आखिर देश के प्रधानमंत्री को भी देश की करोड़ों जनता ने ही चुनकर उस पद पर बैठाया है।

संवैधानिक गरिमा बनाम राजनीतिक मापदंड

​लोकतंत्र के सजग नागरिकों का मानना है कि जनप्रतिनिधियों और संवैधानिक पदों की सुरक्षा और सम्मान के लिए नियम अलग-अलग नहीं हो सकते। यदि एक सांसद का अपमान जनता का अपमान है, तो प्रधानमंत्री किसी एक दल के नहीं बल्कि पूरे राष्ट्र के प्रतिनिधि होते हैं। संसद के भीतर जब उनके खिलाफ अमर्यादित भाषा का प्रयोग होता है, तो वह उन करोड़ों मतदाताओं की भावना को आहत करता है जिन्होंने इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में भरोसा जताया है।

भाषा की मर्यादा पर उठते सवाल

​राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि चाहे संसद के बाहर किसी नेता पर भौतिक हमला हो या संसद के भीतर किसी शीर्ष नेता पर भाषाई हमला, दोनों ही स्थितियां स्वस्थ लोकतंत्र के लिए घातक हैं। हाल के दिनों में संसद के भीतर और बाहर दोनों तरफ से बयानों का स्तर गिरा है, जिससे आम जनता में असंतोष है। जनता का साफ संदेश है कि लोकतंत्र में गरिमा की परिभाषा दलीय राजनीति या सुविधा के अनुसार नहीं बदली जा सकती।

सजग नागरिक मंच का मत: “संसद लोकतंत्र का मंदिर है। यदि हम सड़क पर होने वाली हिंसा को लोकतंत्र पर हमला मानते हैं, जो कि बिल्कुल सही है, तो सदन के भीतर होने वाली भाषाई हिंसा और मर्यादाओं के उल्लंघन को भी उतनी ही गंभीरता से देश का अपमान माना जाना चाहिए।”

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