राजनीतिक इतिहास के पन्नों से: 1967-71 के बीच अस्थिरता और दलबदल का ‘काला अध्याय
दशकों पुराना है सरकारों के गिरने का सिलसिला; 1967-71 के बीच 45 सरकारों का पतन और 1800 विधायकों का पाला बदलना आज भी एक सबक

नईदिल्ली,भोपाल | देश में वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य को लेकर अक्सर आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलता रहता है। सोशल मीडिया से लेकर चाय की चौपालों तक यह बहस छिड़ी है कि ‘दलबदल’ और ‘सरकारें गिराने’ की राजनीति कब शुरू हुई। लेकिन जब हम इतिहास के पन्नों को पलटते हैं, तो चौंकाने वाले आंकड़े सामने आते हैं, जो यह बताते हैं कि सत्ता के लिए विधायकों की खरीद-फरोख्त और सरकारों के पतन का खेल नया नहीं है।
इतिहास के आईने में: 1967-71 का ‘काला अध्याय’
राजनीतिक जानकारों के अनुसार, भारतीय लोकतंत्र का एक दौर ऐसा भी था जब स्थिरता का नामोनिशान नहीं था। आंकड़ों पर गौर करें तो 1967 से 1971 के बीच सिर्फ चार वर्षों के शासनकाल में देशभर में 45 सरकारें गिरा दी गई थीं। उस दौर में राजनीति में ‘आया राम-गया राम’ की संस्कृति इस कदर हावी थी कि करीब 1800 विधायकों ने अपनी निष्ठा बदली और पाला बदला। यह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का वह काला पन्ना है, जिसे आज की पीढ़ी को जानना आवश्यक है।
क्या दलबदल विरोधी कानून बेअसर है?
समय के साथ इन घटनाओं को रोकने के लिए ‘दलबदल विरोधी कानून’ (Anti-Defection Law) लाया गया, जिसका उद्देश्य दलबदल पर अंकुश लगाना था। लेकिन आज की स्थिति को देखें, तो यह कानून भी बौना साबित होता दिख रहा है। अक्सर नेता इस्तीफा देने का नया रास्ता निकाल लेते हैं, जिससे कानून की मूल भावना को ही चुनौती मिलती है। विश्लेषकों का मानना है कि राजनीतिक दलों ने अपनी सुविधा के अनुसार इन कानूनों के तोड़ ढूंढ लिए हैं।
समाधान क्या है: केवल कानून या जन-चेतना?
इस चर्चा में यह बात उभर कर सामने आई है कि केवल कानून बनाकर इस ‘मंडी’ को बंद करना संभव नहीं है। इसका स्थायी समाधान दो स्तरों पर जरूरी है:
- राजनीतिक नैतिकता: जब तक राजनीतिक दलों में विचारधारा और नैतिकता के प्रति समर्पण नहीं होगा, तब तक सत्ता का लालच किसी न किसी रूप में सामने आता रहेगा।
- जागरूक मतदाता: लोकतंत्र में जनता की भूमिका सर्वोपरि है। जब तक मतदाता दलबदल करने वाले जनप्रतिनिधि को चुनावी मैदान में सबक नहीं सिखाएंगे, तब तक यह चक्र चलता रहेगा। जिस दिन जनता यह संदेश दे देगी कि ‘जनादेश बिकाऊ नहीं है’, उसी दिन से दलबदल की यह राजनीति खुद-बखुद सिमट जाएगी।
क्या समय आ गया है ‘राइट टू रिकॉलG’ का?
आज यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या ‘राइट टू रिकॉल’ (Right to Recall) जैसा प्रावधान लाकर जनता को यह अधिकार दिया जाना चाहिए कि यदि उनका प्रतिनिधि दलबदल करता है, तो वे उसे वापस बुला सकें? हालांकि यह एक जटिल प्रक्रिया है, लेकिन लोकतंत्र की शुद्धता के लिए ऐसे ठोस कदम उठाने की मांग समय-समय पर उठती रही है।
निष्कर्ष:
इतिहास से सबक लेते हुए यदि आज के भारत को एक सशक्त लोकतंत्र बनाए रखना है, तो कानून के साथ-साथ जनता की जागरूकता और राजनेताओं की नैतिकता का मेल अनिवार्य है। बिना जन-चेतना के, कोई भी कानून इस दलदली राजनीति को पूरी तरह साफ नहीं कर सकता।




