मायावती का ‘परिवार-मुक्त’ का दांव: उत्तर प्रदेश से लेकर राष्ट्रीय सियासत तक तेज हुई हलचल
BSP सुप्रीमो के ऐलान के बाद क्या समाजवादी पार्टी और कांग्रेस जैसी परिवारवादी पार्टियां छोड़ पाएंगी विरासत की राजनीति? भतीजे आकाश आनंद को बाहर का रास्ता दिखाने के बाद मायावती के नए राजनीतिक संदेश ने क्षेत्रीय दलों की बढ़ाई मुश्किलें।

टुडे इंडिया न्यूज, एमपी
नईदिल्ली/लखनऊ/भोपाल:
उत्तर प्रदेश की राजनीति में बहुजन समाज पार्टी (BSP) सुप्रीमो और पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के एक कड़े फैसले ने भूचाल ला दिया है। पार्टी से जुड़े हालिया घटनाक्रमों और अपने खून के रिश्तों को राजनीति से दूर रखने के ऐतिहासिक ऐलान के बाद अब सूबे समेत देश भर के क्षेत्रीय और राष्ट्रीय दलों में ‘परिवारवाद’ को लेकर नई बहस छिड़ गई है। मायावती के इस कदम ने भारतीय राजनीतिक गलियारों में यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या अन्य दल भी वंशवाद की परिपाटी को त्यागकर ‘परिवार-मुक्त’ होने का साहस जुटा पाएंगे?
मायावती का कड़ा रुख और ‘परिवार-मुक्त’ बसपा का एजेंडा
बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने हाल ही में पार्टी संगठन और उत्तराधिकार को लेकर स्पष्ट संदेश देते हुए यह घोषणा की है कि उनके भाई या परिवार के किसी भी बेटे को पार्टी में कोई बड़ा या छोटा राजनीतिक पद नहीं दिया जाएगा। पार्टी विरोधी गतिविधियों और पारिवारिक प्राथमिकताओं को संगठन से ऊपर रखने के विवाद के चलते अपने भतीजे आकाश आनंद को भी सभी पदों और प्राथमिक सदस्यता से मुक्त करने के बाद मायावती ने यह साफ कर दिया है कि बसपा अब पूरी तरह से परिवारवाद के दायरे से बाहर रहकर डॉ. अंबेडकर और कांशीराम के मिशन को आगे बढ़ाएगी। मायावती के इस कदम को दलित और बहुजन राजनीति में एक कड़ा संदेश माना जा रहा है।
क्या अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी छोड़ेंगे परिवारवाद?
मायावती के इस आक्रामक तेवर के बाद सबसे बड़ा सवाल उत्तर प्रदेश के प्रमुख विपक्षी दल समाजवादी पार्टी (SP) पर उठ रहा है। सपा का ढांचा शुरू से ही पारिवारिक नेतृत्व के इर्द-गिर्द घूमता रहा है। पार्टी संस्थापक मुलायम सिंह यादव के परिवार से लेकर अखिलेश यादव और पार्टी के अन्य पारिवारिक समीकरणों के बीच क्या सपा कभी परिवार-मुक्त संगठन बनने की ओर कदम बढ़ाएगी? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि क्षेत्रीय क्षत्रपों के लिए अपनी पार्टी को परिवार के दायरे से बाहर निकालना अस्तित्व की लड़ाई जैसा है, क्योंकि कैडर बेस पार्टियों के विपरीत इन दलों की धुरी परिवार के पास ही सुरक्षित मानी जाती है।
राष्ट्रीय दलों पर भी टिकी निगाहें: क्या कांग्रेस होगी परिवार-मुक्त?
सिर्फ क्षेत्रीय दल ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस पर भी लंबे समय से परिवारवाद और गांधी परिवार के नेतृत्व को लेकर सवाल उठते रहे हैं। हालांकि कांग्रेस समय-समय पर आंतरिक चुनावों और गैर-गांधी अध्यक्ष के प्रयोग कर चुकी है, लेकिन पार्टी की मुख्य कमान और रणनीतिक फैसले आज भी परिवार के इर्द-गिर्द ही केंद्रित रहते हैं। मायावती के इस दांव के बाद विरोधी दल अब कांग्रेस और अन्य वंशवादी दलों को घेरने के लिए नए सिरे से वैचारिक हथियार तैयार कर रहे हैं।
सियासी नफा-नुकसान और भविष्य की दिशा
मायावती के इस ‘परिवार-मुक्त’ और कड़े अनुशासनात्मक संदेश से एक बात तो तय है कि आगामी विधानसभा चुनावों (विशेषकर यूपी, उत्तराखंड और पंजाब) से पहले राजनीतिक दलों की आंतरिक कलह और रणनीति सतह पर आ गई है। जहां एक तरफ मायावती इसे अंबेडकरवादी आंदोलन की शुद्धता से जोड़ रही हैं, वहीं आलोचकों का मानना है कि यह पार्टी के भीतर नेतृत्व के संकट और नियंत्रण को बनाए रखने की एक सोची-समझी रणनीति भी है। बहरहाल, इस सियासी आंधी ने देश के तमाम वंशवादी दलों को जनता के बीच कटघरे में जरूर खड़ा कर दिया है।
क्या आपको लगता है कि भारत के प्रमुख राजनीतिक दल वंशवादी राजनीति को पूरी तरह खत्म करने की हिम्मत जुटा पाएंगे?




