चक्रवात ‘अर्णव’ का तांडव भी नहीं डिगा पाया आस्था: पुरी के जगन्नाथ मंदिर में आंधी-तूफान के बीच बदली गई 214 फीट ऊंचे शिखर की पताका
तेज हवाओं के बीच फटे ध्वज और रहस्यमयी 'शून्य ग्रंथि' को लेकर भक्तों में चर्चा, सदियों पुरानी परंपरा का हुआ निर्वहन

पुरी (ओडिशा): टुडे इंडिया न्यूज एमपी
ओडिशा और तटीय इलाकों में चक्रवाती तूफान ‘अर्णव’ (Cyclone Arnab) के कारण भारी तबाही, मूसलाधार बारिश और तेज हवाओं का दौर जारी है। खराब मौसम के इस विकट माहौल के बीच भी विश्वप्रसिद्ध पुरी के श्री जगन्नाथ मंदिर की सदियों पुरानी और अटूट परंपरा पर कोई आंच नहीं आई। प्रकृति के कड़े पहरे और खतरनाक हवाओं को धत्ता बताते हुए मंदिर के सेवायतों ने अपनी जान जोखिम में डालकर अपनी जिम्मेदारी पूरी की।
214 फीट ऊंचे शिखर पर बदली गई पताका
मिली जानकारी के अनुसार, चक्रवात ‘अर्णव’ के प्रभाव से पुरी में भी तूफानी हवाएं और भारी बारिश दर्ज की गई। ऐसे कठिन मौसम के बावजूद श्री जगन्नाथ मंदिर के करीब 214 से 215 फीट ऊंचे शिखर पर स्थित नीलचक्र के पास पारंपरिक ‘पतितपावन बाना’ (ध्वज) बदलने की दैनिक रस्म को निभाया गया। चुनरा सेवकों ने अंधी-तूफान की परवाह न करते हुए अत्यंत जोखिम भरे हालात में मंदिर के गुंबद पर चढ़कर इस पवित्र रस्म को सफलतापूर्वक पूरा किया। इसका एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसे देखकर देश-विदेश के भक्त महाप्रभु की महिमा और सेवकों के अदम्य साहस की सराहना कर रहे हैं।
ध्वज में बनी ‘शून्य ग्रंथि’ और फटने की चर्चा
तूफान की बेकाबू और तेज हवाओं के कारण जब नया ध्वज फहराया जा रहा था, तब उसका कुछ हिस्सा आंशिक रूप से फट गया और उसमें हवा के दबाव से एक अजीब सी गांठ बन गई। धार्मिक और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस प्रकार ध्वज में अचानक बनी गांठ को ‘शून्य ग्रंथि’ (Zero Knot) कहा जाता है।
भक्तों की आस्था और मान्यताएं
सोशल मीडिया और स्थानीय श्रद्धालुओं के बीच इस ‘शून्य ग्रंथि’ को लेकर भारी कौतूहल और चर्चा बनी हुई है। कई भक्तों और पुजारियों का मानना है कि यह कोई सामान्य घटना नहीं है, बल्कि एक अलौकिक संकेत है। लोगों की आस्था है कि भगवान जगन्नाथ ने इस रहस्यमयी गांठ के जरिए तूफान के बड़े संकट को बांध लिया और पुरी धाम तथा पूरे ओडिशा को भीषण तबाही से सुरक्षित बचा लिया है। हालांकि, प्रशासन और समझदार वर्ग ने लोगों से किसी भी तरह की अफवाहों या अंधविश्वास से दूर रहने की अपील की है, परंतु इस विपरीत परिस्थिति में भी मंदिर की परंपरा का अनवरत जारी रहना हर किसी को अचंभित कर रहा है।




