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​भारत के सोलर मार्केट पर कब्जा करना चाहता था चीन, विश्व व्यापार संगठन में नई दिल्ली ने दिया ऐसा झटका कि तिलमिला उठा ड्रैगन!

​जिनेवा में चली आर्थिक कूटनीति की बड़ी चाल: चीन द्वारा भारत के खिलाफ विवाद पैनल (Dispute Panel) बनाने के पहले प्रस्ताव को भारत ने किया ब्लॉक; आत्मनिर्भर भारत और PLI स्कीम को सुरक्षित रखने के लिए उठाया मजबूत कदम।

नई दिल्ली/जिनेवा: वैश्विक व्यापार के मोर्चे पर भारत ने चीनी ‘ड्रैगन’ को एक और बड़ा और रणनीतिक झटका दिया है। विश्व व्यापार संगठन (WTO) की जिनेवा में हुई ‘विवाद निपटान संस्था’ (DSB) की अहम बैठक में भारत ने चीन के उस प्रस्ताव को पूरी तरह ब्लॉक (खारिज) कर दिया है, जिसके तहत बीजिंग भारत के घरेलू सोलर और आईटी (IT) इंसेंटिव के खिलाफ एक जांच पैनल बनाना चाहता था।

​भारत के इस कड़े और रणनीतिक रुख से चीनी खेमे में हड़कंप मच गया है। ड्रैगन किसी भी तरह भारत के तेजी से बढ़ते घरेलू सौर ऊर्जा बाजार (Solar Market) में सेंध लगाकर अपनी डंपिंग नीति को दोबारा थोपना चाहता था।

आखिर क्यों तिलमिलाया हुआ है चीन?

​दरअसल, भारत ने देश को सौर ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के लिए चीनी कंपोनेंट्स पर 40% तक बेसिक कस्टम ड्यूटी (BCD) और ALMM (Approved List of Models and Manufacturers) जैसे कड़े नियम लागू कर रखे हैं। इसके साथ ही सरकार PLI (उत्पादन आधारित प्रोत्साहन) योजना के तहत भारतीय कंपनियों को मजबूत कर रही है।

​चीन का आरोप है कि भारत के ये नियम और घरेलू कंपनियों को मिलने वाली वित्तीय मदद डब्ल्यूटीओ (WTO) के नियमों के खिलाफ हैं और इससे चीनी सामानों के साथ भेदभाव हो रहा है। इसी को लेकर चीन ने भारत के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय विवाद पैनल गठित करने की मांग की थी, जिसे भारत ने अपने विशेष अधिकार का उपयोग करते हुए पहली बार में ही खारिज कर दिया।

भारत का दोटूक जवाब: ‘80% बाजार पर कब्जा करने वाले को विडंबना की बात नहीं करनी चाहिए’

​डब्ल्यूटीओ में भारतीय प्रतिनिधियों ने चीन को आईना दिखाते हुए बेहद सख्त बयान दिया। भारत ने कहा कि:

​”यह बेहद ‘विडंबना’ की बात है कि एक ऐसा देश जो पूरी दुनिया के सोलर मॉड्यूल वैल्यू चेन पर 80% से ज्यादा का नियंत्रण अकेले रखता है, वह दूसरे विकासशील देशों में इस उद्योग के वैध और स्वतंत्र विकास को रोकने के लिए ऐसे कदम उठा रहा है।”

 

​भारत ने साफ किया कि देश की नीतियां पूरी तरह से डब्ल्यूटीओ के नियमों के अनुकूल हैं और क्रिटिकल इंफ्रास्ट्रक्चर की सुरक्षा के लिए आत्मनिर्भरता बेहद जरूरी है।

इस फैसले से भारत को क्या होगा नफा-नुकसान?

  • बड़ा नफा (फायदे): भारत के इस ‘वीटो’ से भारतीय सोलर कंपनियों (जैसे टाटा पावर, अडाणी ग्रीन) और आईटी इंफ्रास्ट्रक्चर को अगले 2 से 3 महीनों के लिए एक सुरक्षित माहौल मिल गया है। इससे घरेलू विनिर्माण (Make in India) को बिना किसी अंतरराष्ट्रीय दबाव के तेजी से आगे बढ़ने का मौका मिलेगा।
  • संभावित चुनौती (नुकसान): डब्ल्यूटीओ के नियमों के मुताबिक, चीन अगली बैठक में इस पैनल के लिए दोबारा मांग रख सकता है, जिसे दूसरी बार में ब्लॉक नहीं किया जा सकेगा। हालांकि, भारत की इस कूटनीति ने कानूनी लड़ाई को लंबा खींचने का मौका बना दिया है, जिससे भारतीय उद्योगों को संभलने का पूरा वक्त मिल जाएगा।

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