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​ईरान-अमेरिका के बीच महा-समझौते की जमीन तैयार! 60 दिन की ‘जुगाड़ू डील’ पर बढ़े कदम, जानें ट्रंप के इस MoU की पूरी इनसाइड स्टोरी

​मिसाइल हमलों पर रोक, होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को मुक्त रखना और परमाणु मुद्दे पर बातचीत की शुरुआत; मिड-टर्म चुनाव से पहले ट्रंप की इस अस्थायी रणनीति के मायने और बड़ी शर्तें।

विशेष रिपोर्ट (टुडे इंडिया न्यूज एमपी)

वॉशिंगटन/तेहरान:

मध्य-पूर्व (Middle East) में महीनों से जारी भारी तनाव और सैन्य टकराव के बीच एक बड़ी कूटनीतिक सफलता की खबर आ रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के वार्ताकारों के बीच एक अस्थायी 60 दिनों के मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MoU) यानी सीजफायर एक्सटेंशन डील का मसौदा लगभग तय हो गया है। कूटनीतिक गलियारों में इसे एक ‘जुगाड़ू डील’ या अंतरिम रास्ता कहा जा रहा है, जिसका मुख्य उद्देश्य दोनों देशों को युद्ध के मुहाने से खींचकर बातचीत की मेज पर लाना है।

​हालांकि, इस समझौते पर अंतिम मुहर लगना अभी बाकी है, क्योंकि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के शीर्ष नेतृत्व की अंतिम औपचारिक मंजूरी का इंतजार किया जा रहा है।

क्या-क्या है इस 60 दिन की ‘जुगाड़ू डील’ में?

​इस अस्थायी समझौते के तहत दोनों पक्षों के बीच कुछ बेहद कड़े और महत्वपूर्ण बिंदुओं पर सहमति बनाने की कोशिश की जा रही है:

  • होर्मुज जलडमरूमध्य को मुक्त रखना: वैश्विक तेल व्यापार के लिए सबसे महत्वपूर्ण माने जाने वाले होर्मुज स्ट्रेट को जहाजों की आवाजाही के लिए पूरी तरह खुला और ‘अप्रतिबंधित’ रखा जाएगा। ईरान इस रास्ते पर किसी भी तरह का कोई टोल टैक्स या जहाजों को परेशान करने वाली कार्रवाई नहीं करेगा।
  • समुद्री बारूदी सुरंगें (Mines) हटाना: इस समझौते के तहत ईरान को अगले 30 दिनों के भीतर होर्मुज स्ट्रेट से बिछाई गई सभी समुद्री बारूदी सुरंगों को हटाना होगा।
  • ड्रोन और मिसाइल हमलों पर रोक: सीजफायर को बढ़ाते हुए दोनों पक्ष एक-दूसरे पर या सहयोगियों पर ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइल जैसे घातक हमले पूरी तरह रोकेंगे।
  • परमाणु मुद्दे पर बातचीत की शुरुआत: इस 60 दिनों की अवधि में दोनों देश ईरान के परमाणु कार्यक्रम और अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम (Enriched Uranium) के स्टॉक को लेकर औपचारिक बातचीत की शुरुआत करेंगे। ईरान को यह प्रतिबद्धता जतानी होगी कि वह परमाणु हथियार हासिल करने की कोशिश नहीं करेगा।

अमेरिका और ईरान को क्या मिलेगा?

  • ईरान की मांगें: इस अस्थायी शांति के बदले में ईरान चाहता है कि अमेरिका उस पर लगे कड़े आर्थिक प्रतिबंधों में ढील दे और विदेशों में फ्रीज (जब्त) किए गए उसके अरबों डॉलर के फंड को रिलीज करे। इसके अलावा मानवीय सहायता और जरूरी सामानों की आपूर्ति बहाल करने के लिए एक तंत्र बनाया जाएगा।
  • ट्रंप की नजर मिड-टर्म चुनाव पर: अमेरिका में होने वाले आगामी मिड-टर्म चुनावों और तेल की बढ़ती कीमतों के कारण ट्रंप प्रशासन इस युद्ध को जल्द से जल्द थामना चाहता है।

अब्राहम समझौते की कड़ी शर्त

​इस बीच, डोनाल्ड ट्रंप ने एक नया दांव खेलते हुए इस डील को ‘अब्राहम समझौते’ (Abraham Accords) के विस्तार से जोड़ दिया है। ट्रंप का कहना है कि वे इस समझौते को तभी अंतिम रूप देंगे जब खाड़ी के अन्य प्रमुख मुस्लिम देश (जैसे सऊदी अरब, कतर, पाकिस्तान, तुर्की आदि) भी इस शांति समझौते का हिस्सा बनकर इजरायल के साथ अपने रिश्तों को सामान्य करने की दिशा में आगे बढ़ेंगे।

निष्कर्ष:

भले ही अमेरिकी सीनेट के कुछ कड़े रुख वाले नेता इस अंतरिम समझौते को ईरान के सामने ‘कमजोर नीति’ बता रहे हों, लेकिन इस 60 दिन के MoU ने दुनिया को एक बड़े वैश्विक आर्थिक संकट और तेल युद्ध से बचने की एक उम्मीद जरूर दी है। अब पूरी दुनिया की नजरें डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी नेतृत्व के अंतिम हस्ताक्षरों पर टिकी ह

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