लोकसभा-विधानसभा में महिला आरक्षण का रास्ता साफ: केंद्र सरकार ला सकती है 133वां संविधान संशोधन
1971 की जनगणना के आधार पर ही रहेगा राज्यों का सीट अनुपात, 2011 की जनगणना से होगा परिसीमन

नई दिल्ली/भोपाल:
केंद्र सरकार देश में महिलाओं को विधायिका में उचित प्रतिनिधित्व देने के लिए एक ऐतिहासिक कदम उठाने की तैयारी में है। सूत्रों के अनुसार, सरकार ने संविधान (133वां संशोधन) बिल को लगभग अंतिम रूप दे दिया है। उच्च स्तरीय बैठकों के बाद इस प्रस्ताव को जल्द ही संसद में पेश किया जा सकता है।
क्या होगा इस नए संशोधन में खास?
प्रस्तावित कानून मुख्य रूप से पूर्व में रहे संविधान (131वां संशोधन) बिल का एक संशोधित स्वरूप है। इस बार सरकार ने उन कानूनी और तकनीकी पेचीदगियों को दूर करने की कोशिश की है, जिनकी वजह से पिछला बिल सफल नहीं हो पाया था।
इस संशोधन की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें परिसीमन (Delimitation) को लेकर राज्यों की चिंताओं को पूरी तरह ध्यान में रखा गया है:
- पुराना अनुपात बरकरार: इस प्रस्तावित कानून के तहत 1971 की जनगणना के आधार पर राज्यों के बीच जो लोकसभा सीटों का वर्तमान अनुपात है, उसमें कोई बदलाव नहीं किया जाएगा। इससे उन राज्यों को राहत मिलेगी जिन्हें जनसंख्या नियंत्रण के कारण सीटों में कमी की आशंका थी।
- राज्य के भीतर नए सिरे से सीमांकन: यद्यपि राज्यों के बीच का अनुपात स्थिर रहेगा, लेकिन राज्य के भीतर विभिन्न विधानसभा और लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों की भौगोलिक सीमाएं 2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर फिर से तय की जा सकती हैं।
महिला सशक्तीकरण की दिशा में बड़ा कदम
यह बिल लंबे समय से लंबित महिला आरक्षण की मांग को पूरा करने की दिशा में एक निर्णायक पड़ाव माना जा रहा है। सरकार का मुख्य उद्देश्य संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी को सुनिश्चित करना है। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह बिल पारित हो जाता है, तो देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में महिलाओं का प्रभाव और उनकी भूमिका में बड़ा बदलाव आएगा।
आने वाले दिनों में इस पर राजनीतिक सरगर्मी बढ़ने के आसार हैं, क्योंकि विपक्ष और विभिन्न राज्यों की सरकारें इस पर अपनी प्रतिक्रिया देने की तैयारी में हैं।
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