मध्य प्रदेश: मुख्यमंत्री के खिलाफ जमीन विवाद मामले में खुफिया तंत्र की विफलता पर उठे सवाल
क्या मुख्यमंत्री मोहन यादव के खिलाफ रची जा रही है कोई बड़ी साजिश? प्रशासनिक गलियारों में चर्चाएं तेज

भोपाल, टुडे इंडिया न्यूज एमपी:
मध्य प्रदेश के प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में इन दिनों एक बड़ी बहस छिड़ी है। यह चर्चा मुख्यमंत्री मोहन यादव के परिजनों द्वारा उज्जैन में खरीदी गई जमीनों से जुड़े आरोपों और इस पूरे घटनाक्रम में राज्य की खुफिया पुलिस (Intelligence Wing) की कथित विफलता को लेकर है।
इण्डियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट और आरोपों का दौर
हाल ही में ‘इण्डियन एक्सप्रेस’ में छपी एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि मुख्यमंत्री मोहन यादव के परिजनों ने उज्जैन में उन स्थानों पर भारी मात्रा में जमीन खरीदी, जहाँ बाद में सरकारी सड़कें और अन्य विकास परियोजनाएं प्रस्तावित हुईं। आरोप है कि सरकारी योजनाओं के आने से इन जमीनों की कीमत कई गुना बढ़ गई और मुख्यमंत्री के परिजनों को इसका लाभ मिला।
इस मुद्दे को लेकर मध्य प्रदेश कांग्रेस आक्रामक हो गई है। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंगार और अन्य कांग्रेस नेताओं ने मुख्यमंत्री और उनके परिजनों पर जमीन घोटाले के आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट के किसी जज से इसकी जांच कराने की मांग की है। वहीं, दूसरी ओर भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने इन आरोपों का खंडन करते हुए कहा है कि मुख्यमंत्री और उनके निकटतम परिजनों ने पद संभालने के बाद कोई नई जमीन नहीं खरीदी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल मुख्यमंत्री की पुत्रवधु ने जमीन खरीदी है और अन्य परिजनों के व्यावसायिक निर्णयों को सीधे मुख्यमंत्री से जोड़ना गलत है।
खुफिया तंत्र की ‘अक्षमता’ पर सवाल
इस पूरे प्रकरण का एक दूसरा और अधिक गंभीर पहलू यह है कि जब मीडिया संस्थान और अन्य लोग सरकारी कार्यालयों में मुख्यमंत्री के परिजनों से जुड़े जमीन के दस्तावेज जुटा रहे थे, तब राज्य की खुफिया पुलिस को इसकी भनक तक नहीं लगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि एडीजी (इंटेलिजेंस) की प्राथमिक जिम्मेदारी मुख्यमंत्री और सरकार के खिलाफ चल रही किसी भी संभावित साजिश या विरोधी मुहिम की जानकारी समय रहते सरकार तक पहुँचाना है। 2020 में तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलनाथ के समय हुई राजनीतिक उठापटक की याद दिलाते हुए विश्लेषक इसे इंटेलिजेंस की बड़ी विफलता मान रहे हैं। यदि समय रहते इंटेलिजेंस ने इनपुट दिए होते, तो सरकार स्थिति को पहले से ही संभाल सकती थी।
क्या यह कोई बड़ी साजिश है?
प्रशासनिक हलकों में अब यह सवाल भी उठने लगा है कि क्या यह मुख्यमंत्री मोहन यादव की छवि धूमिल करने की कोई सुनियोजित साजिश है? जानकारों का कहना है कि यदि इंटेलिजेंस तंत्र सक्रिय होता, तो मुख्यमंत्री समय रहते मीडिया के समक्ष अपना पक्ष रखकर इस ‘धमाके’ को बेअसर कर सकते थे।
अब बड़ा सवाल यह है कि राज्य की खुफिया पुलिस मुख्यमंत्री को समय रहते सतर्क रखने में बार-बार असफल क्यों हो रही है? क्या यह केवल कार्यप्रणाली में ढिलाई है या इसके पीछे कोई गहरी साजिश है, जो सरकार को कमजोर करने का प्रयास कर रही है?
इस घटनाक्रम ने मध्य प्रदेश की खुफिया पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगा दिए हैं, जिसके लिए अब आत्म-मंथन की आवश्यकता महसूस की जा रही है




