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UP Election 2027: बंगाल के नतीजों ने उड़ाई अखिलेश की नींद! क्या ‘पंडितों’ और ‘क्षत्रियों’ के सहारे लखनऊ फतह कर पाएगी सपा?

​अमर सिंह का अपमान और वैश्य समाज की बेरुखी; क्या इन कांटों के बीच 2027 में खिल पाएगा 'साइकिल' का कमल?

लखनऊ/भोपाल: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के अप्रत्याशित परिणामों ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी हलचल तेज कर दी है। सूत्रों की मानें तो समाजवादी पार्टी (सपा) के मुखिया अखिलेश यादव बंगाल में भाजपा की प्रचंड जीत और सत्ता परिवर्तन से गहरे दबाव में हैं। 2027 के यूपी विधानसभा चुनावों को देखते हुए अब सपा प्रमुख अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव करने को मजबूर दिख रहे हैं। चर्चा है कि ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का नारा देने वाले अखिलेश अब सवर्णों, विशेषकर क्षत्रिय और ब्राह्मण समाज को साधने के लिए ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ और धार्मिक भविष्यवाणियों का सहारा ले रहे हैं।

क्षत्रिय और ब्राह्मण: क्या पुराने घाव भर पाएंगे अखिलेश?

​अखिलेश यादव अब सार्वजनिक मंचों से क्षत्रिय समाज को उचित सम्मान देने का वादा कर रहे हैं, लेकिन राजनीतिक गलियारों में सवाल उठ रहा है कि क्या क्षत्रिय समाज अमर सिंह के अपमान को भुला पाएगा? अमर सिंह और मुलायम सिंह यादव के रिश्तों में आई कड़वाहट और बाद में अखिलेश काल में उनकी जो उपेक्षा हुई, वह आज भी ठाकुर समाज के एक बड़े वर्ग के बीच चर्चा का विषय रहती है।

​वहीं, ब्राह्मण समाज को रिझाने के लिए अखिलेश अब ज्योतिषियों और पंडितों की भविष्यवाणियों पर भरोसा जता रहे हैं। लेकिन जानकारों का मानना है कि ब्राह्मण मतदाता कभी भी वैश्य समाज के बिना पूर्ण राजनीतिक समीकरण नहीं बनाता। क्या केवल मंदिर जाने या ब्राह्मण सम्मेलन करने से सपा को वह वोट मिल पाएगा जो परंपरागत रूप से भाजपा का कोर वोटर रहा है?

वैश्य समाज की नाराजगी: सपा के लिए बड़ी चुनौती

​समाजवादी पार्टी के लिए सबसे बड़ी मुश्किल वैश्य समाज की ‘बर्बर शासन’ वाली छवि को मिटाना है। व्यापारियों का एक बड़ा वर्ग आज भी सपा के पिछले शासनकाल में कानून-व्यवस्था की स्थिति को याद कर सिहर उठता है। वैश्य समाज को नजरअंदाज कर क्या सपा केवल सामान्य वर्ग के एक हिस्से, पिछड़ों और मुस्लिमों के दम पर 2027 की वैतरणी पार कर पाएगी?

2027 की राह: मुमकिन या नामुमकिन?

​अखिलेश यादव के लिए चुनौती दोहरी है। एक तरफ उन्हें अपने मूल वोट बैंक (यादव और मुस्लिम) को बचाए रखना है, तो दूसरी तरफ उन वर्गों का भरोसा जीतना है जो सालों से सपा से छिटके हुए हैं। बंगाल के नतीजों ने यह साफ कर दिया है कि जनता का मूड कभी भी बदल सकता है। ऐसे में अखिलेश का ‘रणनीति परिवर्तन’ मास्टरस्ट्रोक साबित होगा या केवल एक चुनावी शिगूफा, यह आने वाला वक्त ही बताएगा। फिलहाल, 2027 की कुर्सी तक पहुँचने की राह सपा के लिए कांटों भरी और लगभग ‘नामुमकिन’ नजर आ रही है।

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